क्रिया-प्रतिक्रिया

Posted: April 18, 2014 in Spiritual

Inspiration

तुझमे जो रोता है दर्द
मुझमें वो क्रिया करता
मुझमें वो लडने को आतुर
तुझमे जो सबसे डरता।

तेरी हर बेचैनी मुझमें
मुझमें मुझको बेचैन करे
मुझमें तेरा ये प्रश्न दबा
तुझसे क्यों आखिर चैन डरे?

तू जो सेहता, जैसे रहता
मुझको खलता रहता पल-पल
मुझमें तेरी पीङा जलती
तू चुप न रह न यू अब जल।

तुझमे जो सेहमा रहता
मुझमें उसका विराट रूप
मुझमें उसकी विक्राल हुंकार
तुझमे छाया बन जाती धूप।

तू क्यो इतना लाचार बता
डरता किससे तू इतना आखिर
तू भी है दमदार बहुत
है गैर अगर लगता शातिर।

तेरा रुदन और मेरी क्रिया
मिल जाए और एकजुट हो
हम-तुम जैसे है अनेक
बिखरे से अब एक गुट हो।

मिलकर अब हम कुछ बसाए
अश्क मिटे और हस दे सब
है दानव उनमें जो पलता
हममें रोशन रहता है रब।

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